एक माह में कार्रवाई पूरी करने का निर्देश, फिर आठ महीने तक क्यों खिंचता रहा मामला? जन वितरण विक्रेता प्रकरण में प्रशासनिक कार्रवाई की रफ्तार पर सवाल

गया। फतेहपुर प्रखंड के जन वितरण प्रणाली विक्रेता राजेंद्र प्रसाद, अनुज्ञप्ति संख्या 26/16 से जुड़े अनियमितता के मामले में प्रशासनिक कार्रवाई की लंबी प्रक्रिया अब सवालों के घेरे में है। अनुमंडल पदाधिकारी, सदर गया के कार्यालय से जारी आदेश में जांच पदाधिकारी की रिपोर्ट के आधार पर विक्रेता के विरुद्ध लगाए गए आरोपों को प्रमाणित बताया गया है। इसके बावजूद मामले को अंतिम तार्किक निर्णय तक पहुंचने में कई महीने लग गए। अब सवाल उठ रहा है कि जब जांच और स्पष्टीकरण की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी, तो कार्रवाई में इतना समय क्यों लगा?

दस्तावेज के अनुसार, 09 सितंबर 2025 को ऐप के माध्यम से प्राप्त शिकायत के आधार पर प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी, फतेहपुर द्वारा जन वितरण विक्रेता राजेंद्र प्रसाद की दुकान की जांच की गई थी। जांच के दौरान ई-पॉस मशीन में प्रदर्शित खाद्यान्न और भौतिक रूप से उपलब्ध खाद्यान्न में अंतर पाया गया। रिपोर्ट में 185.20 क्विंटल चावल एवं 47.66 क्विंटल गेहूं की कमी का उल्लेख किया गया।

इसके बाद कार्यालय स्तर से विक्रेता को जांच प्रतिवेदन एवं बयान की छायाप्रति उपलब्ध कराते हुए एक सप्ताह के अंदर स्पष्टीकरण मांगा गया। विक्रेता ने 24 दिसंबर 2025 को अपना स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया। इसके बाद प्रस्तुत दस्तावेजों के सत्यापन के लिए फतेहपुर, टनकुप्पा और वजीरगंज के प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारियों की संयुक्त जांच कराई गई।

संयुक्त जांच में भी विक्रेता की दुकान के स्टॉक का भौतिक सत्यापन किया गया। रिपोर्ट में नवंबर 2020 के लिए आवंटित खाद्यान्न से संबंधित गेहूं 1,465 किलो एवं चावल 2,346 किलो की आपूर्ति नहीं कराए जाने का भी उल्लेख किया गया। बाद में मामले में बोधगया प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी से भी रिपोर्ट मांगी गई और अप्रैल 2026 में पुनः प्रतिवेदन उपलब्ध कराया गया।

जांच में आरोप सही, फिर निर्णय में इतनी देरी क्यों?

अनुमंडल कार्यालय के आदेश में जांच पदाधिकारी द्वारा लगाए गए आरोपों को सत्य प्रमाणित बताया गया है। आदेश में कहा गया है कि विक्रेता द्वारा बिहार लक्षित सार्वजनिक वितरण प्रणाली (नियंत्रण) आदेश, 2016 के संबंधित प्रावधानों का उल्लंघन किया गया है। साथ ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली से संबंधित अन्य प्रावधानों के उल्लंघन का भी उल्लेख है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आदेश में विक्रेता की अनुज्ञप्ति संख्या 26/16 को रद्द करने की कार्रवाई की दिशा में आगे बढ़ने का निर्देश दिया गया है। साथ ही प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी, फतेहपुर को निर्देश दिया गया है कि संबंधित विक्रेता से जुड़े मामले में एक माह के भीतर अंतिम तार्किक निर्णय लेते हुए संचिका का निष्पादन किया जाए।

एक माह में अंतिम निर्णय का निर्देश, तो पहले क्यों नहीं?

यहीं से पूरा मामला सवालों के घेरे में आ जाता है। शिकायत और प्रारंभिक जांच सितंबर 2025 में हुई, जबकि बाद की कार्रवाई दिसंबर 2025, जनवरी 2026, अप्रैल 2026 और मई 2026 तक चलती रही। यानी उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, प्रारंभिक जांच से मई 2026 तक करीब आठ महीने की अवधि गुजर गई।

ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि जब जांच में अनियमितता सामने आ गई थी और विक्रेता से स्पष्टीकरण भी ले लिया गया था, तो अंतिम कार्रवाई में इतनी लंबी प्रक्रिया क्यों चली?

क्या जांच के बाद भी बार-बार रिपोर्ट और स्पष्टीकरण लेने की जरूरत थी? क्या संबंधित फाइल को समयबद्ध तरीके से निपटाने की कोई व्यवस्था नहीं थी? और यदि अंततः एक माह के भीतर अंतिम तार्किक निर्णय लेने का निर्देश देना पड़ा, तो पहले की कार्रवाई में इतना समय किस वजह से लगा?

स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा का विषय बन सकता है कि जन वितरण प्रणाली जैसे संवेदनशील मामले में, जहां गरीब लाभुकों के खाद्यान्न से जुड़ा सवाल हो, वहां कार्रवाई में अनावश्यक देरी की जिम्मेदारी किसकी तय होगी?

क्या यह घर की खेती है?’—प्रशासन से जवाब मांग रहे सवाल

मामले में सामने आए दस्तावेजों के बाद यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि सरकारी खाद्यान्न वितरण और गरीब लाभुकों के अधिकार से जुड़े मामले में कार्रवाई इतनी लंबी क्यों खिंची? क्या हर स्तर पर फाइल को आगे बढ़ाने में महीनों लगना सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है?

लोगों का कहना है कि यदि जांच में आरोप प्रमाणित हो चुके थे, तो दोषी पाए गए विक्रेता के विरुद्ध समय पर निर्णय होना चाहिए था। एक तरफ प्रशासनिक आदेश एक माह में कार्रवाई पूरी करने की बात करता है, दूसरी तरफ शिकायत से अंतिम आदेश तक महीनों का समय लग जाता है। आखिर इस देरी के लिए कौन जिम्मेदार है?

यह पूरा मामला अब सिर्फ एक जन वितरण विक्रेता की अनुज्ञप्ति का नहीं, बल्कि खाद्यान्न वितरण व्यवस्था में जवाबदेही, समयबद्ध कार्रवाई और प्रशासनिक पारदर्शिता का सवाल बन गया है।

भौतिक सत्यापन में भारी कमी मिली तो दुकान उसी समय सील क्यों नहीं हुई?

मामले में सबसे गंभीर सवाल भौतिक सत्यापन की प्रक्रिया को लेकर भी उठ रहा है। प्रारंभिक जांच में ई-पॉस मशीन में प्रदर्शित स्टॉक और दुकान में उपलब्ध वास्तविक खाद्यान्न के बीच भारी अंतर पाया गया था। रिपोर्ट में 185.20 क्विंटल चावल और 47.66 क्विंटल गेहूं की कमी दर्ज की गई।

ऐसे में सवाल है कि जब तत्कालीन प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी (एमओ) द्वारा दुकान का भौतिक सत्यापन किया गया और स्टॉक में इतनी बड़ी कमी सामने आई, तो उसी समय दुकान को सील कर स्टॉक को सुरक्षित क्यों नहीं किया गया?

यदि जांच के समय दुकान में खाद्यान्न कम पाया गया था, तो यह सुनिश्चित करना जांच अधिकारी की जिम्मेदारी थी कि जांच पूरी होने तक संबंधित स्टॉक में किसी प्रकार की छेड़छाड़ या बदलाव न हो। दुकान को तत्काल सील नहीं किए जाने से यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या विक्रेता को बाद में खाद्यान्न की व्यवस्था कर स्टॉक पूरा करने का अवसर मिल गया?

खासकर तब, जब बाद की संयुक्त जांच में स्टॉक का अलग-अलग समय पर भौतिक सत्यापन कराया गया। प्रारंभिक जांच और बाद की जांच के बीच दुकान का स्टॉक सुरक्षित रखने के लिए क्या कदम उठाए गए थे? क्या दुकान को सील किया गया था? यदि नहीं, तो इतनी बड़ी कमी सामने आने के बाद दुकान को खुला रखने का प्रशासनिक आधार क्या था?

जांच की निष्पक्षता पर भी उठे सवाल

मामले में यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि 09 सितंबर 2025 को पहली बार स्टॉक में कमी मिलने के बाद तत्काल क्या कार्रवाई की गई? यदि उसी दिन स्टॉक की कमी दर्ज कर ली गई थी, तो संबंधित खाद्यान्न को सुरक्षित रखने के लिए पंचनामा, सीलिंग या अन्य कोई सुरक्षात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई?

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि बाद में यदि स्टॉक में बदलाव होता है तो यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि कमी वास्तव में जांच के समय कितनी थी और बाद में उसमें कोई बदलाव हुआ या नहीं।

इसलिए प्रशासन को स्पष्ट करना चाहिए कि भौतिक सत्यापन के समय दुकान को सील क्यों नहीं किया गया, स्टॉक की सुरक्षा के लिए क्या व्यवस्था की गई और प्रारंभिक जांच के बाद अंतिम निर्णय में महीनों का समय क्यों लगा?

गरीब लाभुकों के खाद्यान्न से जुड़े इस मामले में अब सिर्फ विक्रेता पर कार्रवाई ही नहीं, बल्कि पूरी जांच प्रक्रिया में हुई देरी और बरती गई सावधानियों की भी समीक्षा जरूरी दिखाई देती है।