मनरेगा से बने खेल मैदान बने उपलों और मवेशियों का अड्डा, सरकारी धन की खुलेआम उड़ रही धज्जियाँ

फतेहपुर। ग्रामीण क्षेत्रों में खेलकूद को बढ़ावा देने, बच्चों और युवाओं को स्वस्थ जीवनशैली से जोड़ने तथा गांवों में आधारभूत खेल संरचना विकसित करने के उद्देश्य से सरकार के द्वारा मनरेगा योजना के तहत फतेहपुर प्रखंड की सभी पंचायतों में लगभग 8 लाख रुपये की लागत से खेल मैदान और रनिंग ट्रैक का निर्माण कराया गया था। लेकिन कुछ ही समय के भीतर इन विकास कार्यों की स्थिति ऐसी हो गई है कि अब यह योजना अपने उद्देश्य से पूरी तरह भटकती नजर आ रही है।

आज हालात यह हैं कि जिन मैदानों पर बच्चों को दौड़ते, खेलते और अभ्यास करते देखा जाना चाहिए था, वहाँ उपले (गोइठा) ठोके जा रहे हैं, मवेशी बाँधे जा रहे हैं और जगह-जगह गंदगी फैली हुई है। खेल मैदान अब खेल के बजाय अव्यवस्था और लापरवाही के प्रतीक बन चुके हैं।

फतेहपुर प्रखंड के मध्य विद्यालय डुब्बा के पास स्थित खेल मैदान इसका जीता-जागता उदाहरण है। इस मैदान की तस्वीरें साफ़ तौर पर यह दिखाती हैं कि किस तरह सरकारी धन से बने विकास कार्यों की अनदेखी की जा रही है। मैदान की समतल जमीन टूट-फूट का शिकार है, रनिंग ट्रैक पहचान में नहीं आता और चारों ओर मवेशियों के बंधने तथा उपले सुखाने के कारण दुर्गंध और गंदगी का माहौल बना हुआ है।

स्थानीय ग्रामीणों और अभिभावकों का कहना है कि मनरेगा जैसी योजनाएँ अब गांव के विकास का साधन नहीं रह गई हैं, बल्कि केवल कागज़ों पर काम दिखाकर सरकारी राशि निकालने और उसमें अधिकारियों व पंचायत प्रतिनिधियों को कमीशन पहुँचाने का माध्यम बनकर रह गई हैं। काम की गुणवत्ता, उसके दीर्घकालीन उपयोग और रखरखाव पर किसी का ध्यान नहीं है।

ग्रामीणों का आरोप है कि योजना के तहत निर्माण तो जल्दबाजी में करा दिया जाता है ताकि भुगतान निकाला जा सके, लेकिन उसके बाद उस संपत्ति की जिम्मेदारी कोई नहीं लेता। न तो पंचायत स्तर पर निगरानी की व्यवस्था है और न ही प्रशासनिक स्तर पर कोई ठोस पहल। परिणामस्वरूप लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद गांव के बच्चों और युवाओं को इसका कोई वास्तविक लाभ नहीं मिल पा रहा है।

संविधान और पंचायती राज व्यवस्था के अनुसार पंचायत के मुखिया और जनप्रतिनिधियों की यह जिम्मेदारी होती है कि वे पंचायत क्षेत्र में हो रहे विकास कार्यों की नियमित निगरानी करें, कार्य की गुणवत्ता सुनिश्चित करें और जनहित से जुड़ी समस्याओं का समाधान करें। लेकिन फतेहपुर प्रखंड में स्थिति इसके ठीक विपरीत नजर आती है। स्थानीय लोगों का कहना है कि अधिकतर मामलों में जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकता जनकल्याण नहीं, बल्कि कमीशन और निजी स्वार्थ बनकर रह गई है।

ग्रामीण युवाओं का कहना है कि यदि इन मैदानों का सही ढंग से रखरखाव किया जाता, तो गांव के बच्चे मोबाइल और नशे जैसी बुरी आदतों से दूर रहकर खेलों में अपना भविष्य तलाश सकते थे। लेकिन आज ये मैदान युवाओं के लिए प्रेरणा का केंद्र बनने के बजाय सरकारी तंत्र की विफलता का उदाहरण बन गए हैं।

अब ग्रामीणों ने जिला प्रशासन और संबंधित विभाग से मांग की है कि मनरेगा योजना के तहत बने खेल मैदानों की स्थिति की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए, दोषी अधिकारियों और पंचायत प्रतिनिधियों पर कार्रवाई की जाए तथा इन मैदानों को अतिक्रमण और दुरुपयोग से मुक्त कर उनके मूल उद्देश्य—खेल और शारीरिक विकास—के लिए उपयोग में लाया जाए।
देखना यह है कि प्रशासन इस गंभीर मुद्दे पर कब तक संज्ञान लेता है, या फिर गांवों का विकास ऐसे ही कागज़ों तक सिमटकर रह जाएगा।